Lakhpati Didi Yojana: नीमच की गांव की महिलाएं बनीं उद्यमी, एक पंचायत में 5 से बढ़कर 36 हुए स्वयं सहायता समूह

मध्य प्रदेश के नीमच जिले में Lakhpati Didi Yojana ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी बदल रही है। कभी परिवार पर छोटी-छोटी जरूरतों के लिए निर्भर रहने वाली महिलाएं अब आटा चक्की, पत्तल-दोना बनाने की इकाई, डेयरी फार्म, टेलरिंग सेंटर, किराना दुकान और कपड़ों की दुकान चला रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत बने स्वयं सहायता समूहों ने इन महिलाओं को पूंजी, प्रशिक्षण और सामूहिक भरोसा दिया है।

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रागिनी की कहानी: कपड़े की दुकान से पत्तल-दोना की मशीन तक

सरवानियाबोर गांव की रागिनी कुंवर राजपूत किसान सहेली स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। पहले उन्होंने छोटी सी कपड़ों की दुकान शुरू की। बाद में समूह की मदद से पत्तल और दोना बनाने की मशीन खरीदी और आय का दूसरा जरिया खड़ा कर लिया। धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ा और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं। अब वे गांव में और भी स्वयं सहायता समूह बना रही हैं और दूसरी महिलाओं को कमाई वाले कामों से जोड़ रही हैं। उनके समूह को ₹6 लाख तक के ऋण की मंजूरी भी मिली है।

मोनिका और दीपिका: गृहिणी से उद्यमी तक का सफर

सरवानियाबोर की ही मोनिका कुंवर नर्मदा स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने से पहले वे गृहिणी थीं और आर्थिक तंगी से जूझ रही थीं। NRLM से जुड़ने के बाद उन्हें रोजगार और आय के नए मौके मिले और घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई। कराड़िया महाराज गांव की दीपिका बागड़ी 2020 में NRLM से जुड़ीं और 13 महिलाओं का खाटू श्याम स्वयं सहायता समूह बनाया। समूह को शुरुआत में 13 सदस्यों के लिए ₹13,000 का रिवॉल्विंग फंड मिला। इसके बाद समूह को ₹1 लाख, ₹2 लाख, ₹5 लाख, ₹9 लाख और फिर ₹12 लाख तक का ऋण समर्थन मिला। इस पैसे से महिलाओं ने डेयरी फार्म और पशु आहार का कारोबार शुरू किया। दीपिका बताती हैं कि उनके ग्राम पंचायत में सक्रिय स्वयं सहायता समूहों की संख्या 5 से बढ़कर 36 हो गई है।

रंजना और ओमकारी: हर महीने ₹20,000 से ज्यादा की कमाई

कराड़िया महाराज की रंजना कुंवर राणावत शिव शक्ति स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। ₹6 लाख के ऋण से उन्होंने 10 सदस्यों वाले समूह के साथ जनरल स्टोर खोला, जिसमें कॉस्मेटिक, बच्चों के कपड़े और महिलाओं के सामान बिकते हैं। अब वे हर महीने करीब ₹20,000 से ₹25,000 कमा रही हैं। समूह से जुड़ने से पहले उनके पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं था और कारोबार के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल लगता था। इसी गांव की ओमकारी सलवी को पहले ₹30,000 और फिर ₹60,000 की मदद मिली। अब उनका समूह ₹6 लाख के ऋण की मंजूरी की प्रक्रिया में है। उन्होंने किराना, चूड़ियों, कपड़ों और जूतों की थोक दुकान खोली है और NRLM से टेलरिंग का प्रशिक्षण लेकर सिलाई का काम भी शुरू किया है।

कैसे काम करती है यह पहल

इस पहल में महिलाओं को रिवॉल्विंग फंड, सामुदायिक निवेश निधि (CIF) और सामुदायिक ऋण (CCL) जैसे माध्यमों से आर्थिक मदद मिलती है। छोटे-छोटे बचत समूह पहले छोटी रकम से शुरुआत करते हैं और समय के साथ बड़े ऋण के पात्र बनते हैं। प्रशिक्षण और सामूहिक निगरानी से कारोबार टिकता है और महिलाएं एक-दूसरे की मदद भी करती हैं। नीमच की ये कहानियां बताती हैं कि सही समय पर छोटी सी पूंजी और भरोसा मिलने से ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे गांव की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं।

क्यों खास है समूह की ताकत

अकेले कारोबार शुरू करना ग्रामीण महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। पूंजी की कमी, बाजार तक पहुंच न होना और परिवार का भरोसा न मिलना, ये तीनों रुकावटें एक साथ आती हैं। स्वयं सहायता समूह इन तीनों का हल निकालता है। समूह में महिलाएं छोटी-छोटी बचत जमा करती हैं, एक-दूसरे को ऋण देती हैं और बैंक से बड़े ऋण के लिए सामूहिक गारंटी बनती है। प्रशिक्षण से उन्हें हिसाब-किताब, गुणवत्ता और बिक्री की समझ भी मिलती है। नीमच की महिलाओं ने यही रास्ता अपनाया है। किसी ने डेयरी से शुरुआत की, किसी ने दुकान से और किसी ने सिलाई से। धीरे-धीरे आय बढ़ी तो परिवार का भरोसा भी बढ़ा और गांव की दूसरी महिलाएं भी आगे आईं। यही वजह है कि एक पंचायत में समूहों की संख्या 5 से बढ़कर 36 तक पहुंच गई। यह बदलाव सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का भी है।

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